Gram Panchayat Committees : भारत में गांव की सरकार यानी ग्राम पंचायत केवल प्रधान के भरोसे नहीं चलती। गांव के विकास कार्यों में पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए ग्राम पंचायत की विभिन्न समितियों का गठन किया जाता है।
अक्सर लोग सोचते हैं कि पंचायत के सारे फैसले अकेले प्रधान लेता है, लेकिन हकीकत में ये समितियाँ ही पंचायत की ‘आंख, कान और दिमाग’ होती हैं।
आइए, ‘यूपी की जानकारी’ के इस विशेष लेख में जानते हैं कि ये समितियाँ क्या हैं और ये कैसे काम करती हैं।
पंचायत समिति क्या है? (What is Panchayat Samiti/Committee?)
ग्राम पंचायत के कामों को सुचारू रूप से चलाने और मतभेदों को दूर करने के लिए विशेष कार्य समूहों का गठन किया जाता है, जिन्हें पंचायत समितियाँ कहते हैं।
- गठन: इनका गठन हर 5 साल में पंचायत चुनाव के बाद होता है।
- सदस्य: हर समिति में एक अध्यक्ष और 5 से 6 सदस्य होते हैं।
- अनिवार्यता: इन समितियों में महिलाओं, अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के सदस्यों का होना अनिवार्य है।
ग्राम पंचायत की 6 प्रमुख समितियाँ और उनके कार्य
उत्तर प्रदेश पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत मुख्य रूप से निम्नलिखित समितियाँ सक्रिय रहती हैं:
1. ग्राम नियोजन एवं विकास समिति
- अध्यक्ष: ग्राम प्रधान (सरपंच)।
- कार्य: गांव के विकास की योजनाएं तैयार करना, खेती-किसानी, पशुपालन और गरीबी हटाओ कार्यक्रमों का संचालन करना।
2. ग्राम शिक्षा समिति
- अध्यक्ष: उप-प्रधान या पंचायत का वरिष्ठ सदस्य।
- सचिव: गांव के सरकारी स्कूल का प्रधानाध्यापक (Headmaster)।
- कार्य: स्कूलों की स्थिति सुधारना, मिड-डे मील (Mid-day Meal) की निगरानी करना और साक्षरता अभियान चलाना।
3. ग्राम निर्माण कार्य समिति
- अध्यक्ष: पंचायत द्वारा नामित कोई सदस्य।
- कार्य: गांव में होने वाले सभी निर्माण कार्यों (सड़क, नाली, खड़ंजा) की गुणवत्ता सुनिश्चित करना और जलापूर्ति व बिजली के कामों को देखना।
4. ग्राम प्रशासनिक समिति
- अध्यक्ष: ग्राम प्रधान।
- कार्य: पंचायत की प्रशासनिक व्यवस्था और राशन की दुकान (कोटेदार) से संबंधित कार्यों की निगरानी करना।
5. स्वास्थ्य एवं कल्याण समिति
- सचिव: गांव की आशा (ASHA) या एएनएम (ANM)।
- कार्य: स्वास्थ्य सेवाएं, परिवार कल्याण और महिला एवं बाल विकास योजनाओं (जैसे आंगनबाड़ी) का संचालन करना।
6. जल प्रबंधन एवं सामाजिक न्याय समिति
- कार्य: राजकीय नलकूपों का संचालन, पेयजल व्यवस्था और पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा करना ताकि गांव में सामाजिक सौहार्द बना रहे।
समितियों की बैठक और नियम
पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत करने के लिए इन समितियों की सक्रियता बहुत जरूरी है:
- बैठक: हर समिति की महीने में कम से कम एक बैठक होना अनिवार्य है।
- कोरम (गणपूर्ति): बैठक तभी मान्य होगी जब कम से कम 4 सदस्य उपस्थित हों।
- रजिस्टर: बैठक में जो भी चर्चा या निर्णय हो, उसे कार्यवाही रजिस्टर में लिखना अनिवार्य है।
पंचायत समितियों का महत्व: क्यों हैं ये जरूरी?
- जवाबदेही: प्रधान की मनमानी पर रोक लगती है और जवाबदेही बढ़ती है।
- दक्षता: अनुभवी लोग अपने विषय (जैसे शिक्षा या स्वास्थ्य) पर बेहतर निर्णय ले पाते हैं।
- भागीदारी: महिलाओं और पिछड़े वर्गों को शासन में सीधे तौर पर शामिल होने का मौका मिलता है।
- पारदर्शिता: निर्माण कार्यों में होने वाले भ्रष्टाचार को रोकने में ये समितियाँ ‘वॉचडॉग’ का काम करती हैं।
ग्राम पंचायत समितियों से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
उत्तर: उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम के अनुसार, ग्राम स्तर पर मुख्य रूप से 6 समितियाँ (जैसे नियोजन एवं विकास, शिक्षा, प्रशासनिक, निर्माण कार्य, स्वास्थ्य एवं कल्याण, और जल प्रबंधन) गठित की जाती हैं।
उत्तर: नहीं, ग्राम पंचायत की इन समितियों के सदस्यों को कोई मासिक वेतन नहीं मिलता है। यह एक स्वैच्छिक और सेवा आधारित पद है। हालांकि, बैठकों में शामिल होने के लिए कुछ विशेष प्रावधानों के तहत अल्प भत्ता मिल सकता है, लेकिन यह कोई नियमित सैलरी नहीं है।
उत्तर: नहीं। ग्राम प्रधान केवल नियोजन एवं विकास समिति और प्रशासनिक समिति का अध्यक्ष होता है। अन्य समितियों जैसे शिक्षा या निर्माण समिति के अध्यक्ष उप-प्रधान या पंचायत द्वारा नामित सदस्य होते हैं। इससे सत्ता का संतुलन बना रहता है।
उत्तर: तकनीकी रूप से, ग्राम पंचायत की कई योजनाओं का बजट पास करने और ऑडिट करने के लिए इन समितियों की रिपोर्ट जरूरी होती है। समितियों के बिना प्रधान का अकेले निर्णय लेना नियमों के विरुद्ध माना जा सकता है और जांच के घेरे में आ सकता है।
उत्तर: समितियों के सदस्य मुख्य रूप से चुने हुए वार्ड सदस्य (पंच) ही होते हैं। हालांकि, कुछ समितियों (जैसे शिक्षा समिति) में विशेषज्ञों या सरकारी कर्मचारियों (जैसे हेडमास्टर या ANM) को सचिव या सदस्य के रूप में शामिल किया जाता है।
निष्कर्ष
ग्राम पंचायत की समितियाँ ही वह जरिया हैं जिससे ‘स्थानीय स्वशासन’ की जड़ें मजबूत होती हैं। यदि आपके गांव में ये समितियाँ निष्क्रिय हैं, तो एक जागरूक नागरिक के तौर पर आपको इनके पुनर्गठन और बैठकों की मांग करनी चाहिए।
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