वरासत कैसे कराएं? 2026 में उत्तराधिकार ऑनलाइन आवेदन, वाद यूपी, नामांतरण और खतौनी अपडेट की पूरी प्रक्रिया

अगर किसी जमीन के मालिक (खातेदार) की मृत्यु हो जाती है, तो उनके कानूनी वारिसों को जमीन अपने नाम करानी होती है। इसी प्रक्रिया को वरासत या उत्तराधिकार कहते हैं। इसके लिए उत्तर प्रदेश राजस्व परिषद के ऑनलाइन पोर्टल पर आवेदन करना होता है। जब राजस्व अधिकारी इस पर अपना आदेश जारी कर देते हैं, तब सरकारी रिकॉर्ड (खतौनी) में नए वारिसों के नाम दर्ज हो जाते हैं। इसके बाद ही जमीन के रिकॉर्ड पूरी तरह अपडेट माने जाते हैं।

मुख्य बिन्दु

  • वरासत क्या है? मृत व्यक्ति की जमीन को उसके कानूनी वारिसों के नाम चढ़ाने की सरकारी प्रक्रिया।
  • कैसे करें आवेदन? यह प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन है। आप राजस्व परिषद यूपी के पोर्टल से इसे खुद या जनसेवा केंद्र से कर सकते हैं।
  • सबसे जरूरी कागज: मरने वाले व्यक्ति का ‘मृत्यु प्रमाण पत्र’ (Death Certificate) होना सबसे ज्यादा जरूरी है।
  • जांच कैसे होती है? ऑनलाइन फॉर्म भरने के बाद स्थानीय लेखपाल इसकी जांच करता है और अपनी रिपोर्ट राजस्व निरीक्षक (RI) को भेजता है।
  • नाम कब चढ़ता है? राजस्व निरीक्षक का आदेश होते ही कंप्यूटर खतौनी में वारिसों के नाम दर्ज हो जाते हैं।
  • स्टेटस कैसे देखें? आप अपने आवेदन की स्थिति और सरकारी आदेश को ‘वाद यूपी’ (VAAD UP / RCCMS) पोर्टल पर कभी भी ऑनलाइन देख सकते हैं।

वरासत क्या है?

सीधे और सरल शब्दों में कहें तो,

वरासत (Land Inheritance) वह प्रक्रिया है जिसके जरिए किसी मृत व्यक्ति की जमीन का मालिकाना हक उसके जीवित कानूनी वारिसों को मिलता है। जब तक सरकारी कागजात (जैसे खतौनी) में मृत व्यक्ति का नाम हटाकर वारिसों का नाम नहीं चढ़ाया जाता, तब तक यह प्रक्रिया अधूरी रहती है। ग्रामीण इलाकों में आम बोलचाल में इसे ‘फौती नामांतरण’ भी कहा जाता है।

उत्तराधिकार और वरासत में क्या अंतर है?

  • उत्तराधिकार (Succession): यह आपका कानूनी अधिकार है। कानून के मुताबिक (जैसे हिंदू या मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत), किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति पर उसके बच्चों या परिवार का अधिकार अपने आप बन जाता है।
  • वरासत (Varasat): यह उस अधिकार को सरकारी कागजों में दर्ज कराने की प्रशासनिक प्रक्रिया है। यानी, अधिकार मिलना उत्तराधिकार है और उसे कागजों में चढ़वाना वरासत है।

किन परिस्थितियों में वरासत करानी पड़ती है?

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता के नियमों के अनुसार, नीचे दी गई स्थितियों में वरासत कराना कानूनी रूप से जरूरी हो जाता है:

  • पिता की मृत्यु होने पर: यदि जमीन पिता के नाम थी, तो उनकी मृत्यु के बाद उनके बेटों, अविवाहित बेटियों और पत्नी के नाम वरासत होती है।
  • माता की मृत्यु होने पर: अगर जमीन माता के नाम दर्ज थी, तो उनकी मृत्यु के बाद उनके बच्चों या कानूनी वारिसों को वरासत करानी होती है।
  • पति की मृत्यु होने पर: पति के दुनिया में न रहने के बाद उनकी पत्नी और बच्चों के नाम जमीन ट्रांसफर करने के लिए।
  • अविवाहित व्यक्ति की मृत्यु होने पर: अगर मरने वाले व्यक्ति की शादी नहीं हुई थी, तो कानून में तय क्रम के अनुसार (जैसे सगे भाई-बहन या माता-पिता) वरासत की जाती है।
  • संयुक्त परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु होने पर: अगर किसी साझे की जमीन में किसी एक हिस्सेदार की मृत्यु हो जाती है, तो उसके हिस्से को उसके बच्चों के नाम करने के लिए।

वरासत कराना क्यों जरूरी है?

कई बार लोग जमीन पर सिर्फ अपना कब्जा देखकर निश्चिंत हो जाते हैं, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड दुरुस्त न होने पर भविष्य में बड़ी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। वरासत इन कारणों से बेहद जरूरी है:

  • खतौनी में नाम दर्ज कराने के लिए: जब तक सरकारी रिकॉर्ड (खतौनी) में आपका नाम नहीं आता, तब तक कानूनन आपको उस जमीन का मालिक नहीं माना जाता।
  • जमीन बेचने के लिए: अगर आप भविष्य में उस जमीन को बेचना चाहते हैं, तो जब तक खतौनी में आपका नाम नहीं होगा, तब तक रजिस्ट्री कार्यालय (Registry Office) में उस जमीन का बैनामा नहीं हो सकता।
  • बैंक से लोन लेने के लिए: खेती की जमीन पर केसीसी (KCC – किसान क्रेडिट कार्ड) बनवाने या किसी भी तरह का सरकारी/प्राइवेट बैंक लोन लेने के लिए बैंक हमेशा आपके नाम की अपडेटेड खतौनी मांगता है।
  • किसान सम्मान निधि का लाभ पाने के लिए: ‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि’ या खेती से जुड़ी अन्य सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे अपने बैंक खाते में पाने के लिए जमीन का म्यूटेशन (वरासत) होना अनिवार्य है।
  • सरकारी योजनाओं का लाभ: सरकारी ट्यूबवेल कनेक्शन, खाद-बीज पर मिलने वाली सब्सिडी या फसल खराब होने पर मिलने वाला बीमा क्लेम तभी मिलता है जब जमीन आपके नाम पर हो।
  • पारिवारिक विवादों से बचने के लिए: अगर समय पर वरासत न कराई जाए, तो बाद में दूर के रिश्तेदार या भू-माफिया फर्जी कागजात बनाकर जमीन पर गलत दावा कर सकते हैं।

उत्तर प्रदेश में वरासत का कानूनी आधार क्या है?

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 33 क्या कहती है?

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता (UP Revenue Code) की धारा 33 पूरी तरह से उत्तराधिकार और वरासत के मामलों से जुड़ी है। यह धारा कहती है कि जब भी किसी जमीन के मालिक की मृत्यु होगी, तो उसके उत्तराधिकार की जानकारी सरकार को देना जरूरी है। अगर मामले में कोई आपसी विवाद नहीं है, तो राजस्व निरीक्षक (कानूनगो) को यह अधिकार है कि वह सीधे ही वरासत का आदेश जारी कर सके।

राजस्व परिषद (Board of Revenue) की भूमिका

राजस्व परिषद्, उत्तर प्रदेश राज्य में जमीन और राजस्व से जुड़े मामलों की सबसे बड़ी संस्था है। जनता की सहूलियत के लिए राजस्व परिषद ने अब इस पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन कर दिया है। अब आपको तहसील के चक्कर काटने की जरूरत नहीं है; आप घर बैठे Online Varasat UP के जरिए आवेदन कर सकते हैं, अपने आवेदन का स्टेटस देख सकते हैं और आदेश की कॉपी भी डाउनलोड कर सकते हैं।

वरासत कराने के लिए कौन पात्र है?

कानून के मुताबिक, वरासत का हक एक तय क्रम में मिलता है। मुख्य रूप से निम्नलिखित लोग इसके पात्र होते हैं:

  1. पुत्र और पुत्री: मृत व्यक्ति के बेटे और बेटियां (चाहे बेटी शादीशुदा हो या अविवाहित, दोनों का बराबर हक होता है)।
  2. पत्नी: मृत व्यक्ति की विधवा पत्नी।
  3. माता-पिता: अगर मृत व्यक्ति की अपनी कोई संतान या पत्नी न हो, तो विशेष स्थितियों में माता-पिता को हक मिलता है।
  4. अन्य कानूनी वारिस: अगर ऊपर दिए गए करीबी रिश्तेदार नहीं हैं, तो राजस्व संहिता में दिए गए क्रम के अनुसार अन्य रिश्तेदारों को मौका मिलता है।
  5. वसीयत के लाभार्थी: अगर मरने वाले व्यक्ति ने अपनी जिंदगी में किसी के नाम रजिस्टर्ड वसीयत (Will) की थी, तो वह व्यक्ति वरासत का दावा कर सकता है। (हालांकि, वसीयत के मामले सीधे लेखपाल नहीं निपटाता, यह कोर्ट के जरिए होता है)।

वरासत कराने के लिए कौन-कौन से दस्तावेज (कागज) लगते हैं?

आवेदन करने से पहले नीचे दिए गए कागजात अपने पास जरूर तैयार रख लें:

जरूरी दस्तावेज (Mandatory Documents)

  • मृत्यु प्रमाण पत्र (Death Certificate): यह सबसे महत्वपूर्ण कागज है। यह ग्राम पंचायत, ब्लॉक या नगर निकाय द्वारा जारी किया गया डिजिटल (बारकोड वाला) होना चाहिए।
  • वारिसों के पहचान पत्र: सभी उत्तराधिकारियों का आधार कार्ड या अन्य सरकारी पहचान पत्र।
  • परिवार रजिस्टर की नकल: अपनी ग्राम पंचायत या नगर पालिका से जारी परिवार रजिस्टर की नई नकल, जिसमें मृतक का नाम कट चुका हो और मृत्यु की तारीख दर्ज हो।
  • खतौनी की कॉपी: उस जमीन की वर्तमान खतौनी, जिसमें खाता संख्या और गाटा संख्या (खेत का नंबर) साफ लिखा हो।
  • मोबाइल नंबर: फॉर्म भरते समय ओटीपी (OTP) पाने के लिए एक चालू मोबाइल नंबर।

विशेष या विवादित मामलों में

  • रजिस्टर्ड वसीयत (Will): अगर मृतक ने कोई वसीयत छोड़ी हो।
  • उत्तराधिकारी प्रमाण पत्र (Succession Certificate): अगर वारिस होने को लेकर कोई तकनीकी पेच हो (यह कोर्ट से बनता है)।
  • शपथ पत्र (Affidavit): कई बार लेखपाल सुरक्षा के तौर पर एक नोटरी शपथ पत्र मांगते हैं, जिसमें यह लिखा होता है कि आपके अलावा मृतक का कोई और वारिस नहीं है।

उत्तर प्रदेश में ऑनलाइन वरासत आवेदन कैसे करें?

राजस्व परिषद उत्तर प्रदेश के पोर्टल पर वरासत के लिए ऑनलाइन फॉर्म भरने का तरीका नीचे दिया गया है:

  • Step 1: वेबसाइट पर जाएं
    सबसे पहले राजस्व परिषद्, उत्तर प्रदेश की आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं और ‘उत्तराधिकार/वरासत (धारा-33)’ या RCCMS पोर्टल के लिंक पर क्लिक करें।
  • Step 2: मोबाइल नंबर और OTP
    अपना चालू मोबाइल नंबर भरें। आपके फोन पर एक ओटीपी (OTP) आएगा, उसे स्क्रीन पर डालकर लॉगिन करें।
  • Step 3: मृतक की जानकारी भरें
    यहाँ मृत खातेदार का नाम, उनके पिता या पति का नाम, मृत्यु की तारीख और उनका पूरा पता सही-सही भरें। साथ ही मृत्यु प्रमाण पत्र का नंबर भी दर्ज करें।
  • Step 4: जमीन का विवरण (गाटा संख्या) चुनें
    अपने जिले, तहसील, परगना और गांव का नाम चुनें। इसके बाद अपनी जमीन का सही Gata Number या खाता संख्या चुनें। सिस्टम अपने आप उस जमीन की पूरी जानकारी स्क्रीन पर दिखा देगा।
  • Step 5: वारिसों के नाम दर्ज करें
    अब उन सभी जीवित वारिसों के नाम, उनकी उम्र, मृतक से उनका क्या रिश्ता है और उनका पता साफ-साफ भरें, जिनका नाम आप खतौनी में चढ़वाना चाहते हैं।
  • Step 6: कागज अपलोड करें
    मृत्यु प्रमाण पत्र और परिवार रजिस्टर की नकल को स्कैन करके (PDF फॉर्मेट में) तय साइज के अनुसार अपलोड करें।
  • Step 7: फॉर्म सबमिट करें
    एक बार पूरे फॉर्म को दोबारा अच्छी तरह पढ़ लें कि कहीं कोई गलती तो नहीं है। सब कुछ सही होने पर ‘सबमिट’ बटन दबाएं। फॉर्म सबमिट होते ही आपको एक आवेदन संख्या (Application Number) मिलेगी, इसे संभालकर नोट कर लें।

आवेदन करने के बाद क्या होता है?

जब आप ऑनलाइन फॉर्म जमा कर देते हैं, तो आपकी फाइल सरकारी स्तर पर आगे बढ़ती है:

1. जांच का चरण (Verification)

  • लेखपाल के पास फाइल जाना: आपका आवेदन सीधे आपके क्षेत्र के लेखपाल के ऑनलाइन लॉगिन पर पहुंच जाता है। लेखपाल आपके गांव में आकर या स्थानीय लोगों से पूछकर यह पक्का करता है कि जो वारिस दिखाए गए हैं वो सही हैं या नहीं, और कोई वारिस छूटा तो नहीं है।
  • राजस्व निरीक्षक (RI) को रिपोर्ट: लेखपाल अपनी जांच पूरी करके रिपोर्ट को ऑनलाइन ही अपने से बड़े अधिकारी यानी राजस्व निरीक्षक (कानूनगो) को भेज देता है।
  • सार्वजनिक सूचना जारी होना: तहसील या ग्राम सभा के स्तर पर एक नोटिस जारी किया जाता है। इसका मकसद यह होता है कि अगर किसी दूसरे व्यक्ति को इस वरासत से कोई आपत्ति (Objection) है, तो वह तय समय (आमतौर पर 15 से 30 दिन) के अंदर अपनी शिकायत दर्ज करा सके।

2. अंतिम आदेश (The Final Order)

  • अगर तय समय के अंदर किसी की कोई आपत्ति या शिकायत नहीं आती, तो मामला ‘निर्विवाद’ (बिना किसी झगड़े का) मान लिया जाता है।
  • इसके बाद राजस्व निरीक्षक (RI) या तहसीलदार वरासत को मंजूरी देते हुए ऑनलाइन आदेश (Varasat Order) जारी कर देते हैं।

वरासत का आदेश होने के बाद क्या करें?

कई लोग सोचते हैं कि कंप्यूटर पर आदेश दिख गया तो काम पूरा हो गया, लेकिन आपको ये जरूरी कदम जरूर उठाने चाहिए:

  • नई खतौनी तुरंत डाउनलोड करें: आदेश होने के कुछ दिनों के भीतर ही सरकारी रिकॉर्ड बदल जाता है। यूपी भूलेख (Bhulekh UP) की वेबसाइट पर जाकर नई खतौनी डाउनलोड करें।
  • नामों की स्पेलिंग चेक करें: अच्छी तरह देख लें कि सभी वारिसों के नाम हिंदी में बिल्कुल सही लिखे हैं या नहीं। नामों में मामूली गलती भी आगे चलकर बड़ी परेशानी खड़ी कर देती है।
  • वारिसों की गिनती: चेक करें कि जितने लोगों के नाम आपने दिए थे, उन सभी के नाम दर्ज हुए हैं या नहीं।
  • गाटा संख्या का मिलान: यह देख लें कि आपके सभी खेतों या प्लॉट के नंबरों पर आपका नाम चढ़ गया है।
  • प्रमाणित प्रति (Certified Copy) निकालें: भविष्य में बैंक लोन या किसी कानूनी काम के लिए तहसील के जनसेवा केंद्र से डिजिटल साइन वाली ‘प्रमाणित खतौनी’ निकालकर अपने पास सुरक्षित रख लें।

वरासत के बाद क्या अलग से नामांतरण (Mutation) कराना पड़ता है?

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता के अनुसार, अगर मामला पूरी तरह से साफ है और परिवार में कोई विवाद नहीं है, तो धारा 33 के तहत होने वाली इसी वरासत प्रक्रिया से ही खतौनी में आपका नाम चढ़ जाता है। इसके लिए अलग से किसी नामांतरण (Mutation / दाखिल-खारिज) की जरूरत नहीं होती।

लेकिन, अगर जमीन किसी ‘वसीयत’ के आधार पर मिल रही है या उत्तराधिकार को लेकर कोई अदालती विवाद था जो बाद में सुलझा है, तो ऐसी स्थिति में धारा 34 के तहत नामांतरण (Mutation) का केस राजस्व कोर्ट में दाखिल करना पड़ता है, तभी मालिकाना हक ट्रांसफर होता है।

वरासत के बाद जमीन बेच सकते हैं क्या?

  • कब बेच सकते हैं?: जैसे ही वरासत की प्रक्रिया पूरी हो जाती है और खतौनी में आपका नाम दर्ज (Khatauni Update) हो जाता है, आप उसके तुरंत बाद अपनी जमीन बेच सकते हैं।
  • किन कागजों की जरूरत होगी?: जमीन बेचने के लिए आपके पास नई अपडेटेड खतौनी, आपका आधार/पहचान पत्र और जमीन के पुराने कागजात होने चाहिए।
  • नाम चढ़ना क्यों जरूरी है?: आजकल रजिस्ट्री दफ्तर का सिस्टम सीधे भूलेख (सरकारी वेबसाइट) से जुड़ा हुआ है। अगर खतौनी में अब भी मृत व्यक्ति का ही नाम दिख रहा होगा, तो कंप्यूटर आपकी जमीन की नई रजिस्ट्री की अनुमति नहीं देगा। इसलिए पहले नाम चढ़वाना जरूरी है।

वरासत के बाद जमीन का आपसी बंटवारा कैसे करें?

मान लीजिए पिता की मृत्यु के बाद उनके तीन बेटों का नाम खतौनी में आ गया है, तो वह जमीन अभी भी ‘संयुक्त खाता’ (इकट्ठी जमीन) कहलाएगी। अपनी-अपनी जमीन को कानूनी रूप से बिल्कुल अलग करने के लिए बंटवारा करना पड़ता है:

  • अगर आपसी सहमति हो (Amicable Settlement): सभी हिस्सेदार आपस में बैठकर रजामंदी से एक ‘बंटवारानामा’ (Partition Deed) तैयार कर सकते हैं और तहसीलदार या एसडीएम के सामने आपसी सहमति का केस दायर कर अपनी खतौनी (खाता) अलग-अलग करवा सकते हैं।
  • अगर आपसी सहमति न हो (Disputed Partition): अगर भाइयों या हिस्सेदारों में विवाद है, तो आपको उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 116 के तहत एसडीएम कोर्ट (SDM Court) में बंटवारे का मुकदमा करना होगा। इसके बाद कोर्ट लेखपाल से जमीन नपवाकर सबका हिस्सा कानूनी तौर पर अलग करता है।

वरासत आवेदन की स्थिति ऑनलाइन कैसे देखें?

आप अपने फोन या कंप्यूटर से कभी भी चेक कर सकते हैं कि आपका काम कहाँ तक पहुँचा है:

  1. VAAD UP या राजस्व परिषद की वेबसाइट पर जाएं।
  2. ‘उत्तराधिकार/वरासत आवेदन की स्थिति’ वाले विकल्प पर क्लिक करें।
  3. अपना आवेदन संख्या (Application Number) या फॉर्म में भरा गया मोबाइल नंबर डालें।
  4. स्क्रीन पर तुरंत दिख जाएगा कि आपका आवेदन लेखपाल, कानूनगो या तहसीलदार में से किसके पास रुका हुआ है। काम पूरा होने पर आप यहीं से डिजिटल Varasat Order भी डाउनलोड कर सकते हैं।

वाद यूपी (VAAD UP) और RCCMS क्या है?

VAAD UP उत्तर प्रदेश सरकार का एक खास पोर्टल है, जिसका पूरा नाम RCCMS (Revenue Courts Computerized Management System – राजस्व न्यायालय कंप्यूटरीकृत प्रबंधन प्रणाली) है।

  • यह किस काम आता है?: इस पोर्टल के जरिए यूपी की सभी राजस्व अदालतों (नायब तहसीलदार की कोर्ट से लेकर लखनऊ/इलाहाबाद राजस्व परिषद तक) को ऑनलाइन जोड़ दिया गया है।
  • मुकदमे की स्थिति (Case Status): अगर आपकी वरासत को लेकर कोई विवाद हो जाता है और मामला कोर्ट में चला जाता है, तो आप यहाँ अपने केस की स्थिति देख सकते हैं।
  • विवादित गाटा की खोज: जमीन खरीदने से पहले आप इस पोर्टल पर यह चेक कर सकते हैं कि उस खेत या प्लॉट पर तहसील में कोई मुकदमा तो नहीं चल रहा है।
  • तारीख और आदेश: आप घर बैठे देख सकते हैं कि आपके केस की अगली सुनवाई कब है और कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया है।

राजस्व न्यायालय (Revenue Court) क्या होता है?

उत्तर प्रदेश में जमीन-जायदाद, खेती और राजस्व से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए अलग-अलग स्तर पर अदालतें बनी हुई हैं:

राजस्व न्यायालय (Court)मुख्य काम और अधिकार
तहसीलदार कोर्टदाखिल-खारिज (म्यूटेशन), सामान्य वरासत और शुरुआती जमीन संबंधी मामलों की सुनवाई।
एसडीएम (SDM) कोर्टजमीन का कानूनी बंटवारा (धारा 116), जमीन की नापी/पैमाइश (धारा 24) और बेदखली के मामले।
एडीएम (ADM) Courtजिला स्तर की अदालत जहाँ स्टाम्प ड्यूटी और तहसीलदार/एसडीएम के फैसलों के खिलाफ अपील सुनी जाती है।
कमिश्नर कोर्टमंडल (Divisional) स्तर की अदालत जो जिला स्तर के अधिकारियों के फैसलों की समीक्षा करती है।
राजस्व परिषद् (Board of Revenue)उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी राजस्व अदालत। इसके बाद सिर्फ हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का विकल्प बचता है।

अगर वरासत पर कोई विवाद या आपत्ति हो जाए तो क्या करें?

  • आपत्ति कैसे दर्ज करें?: अगर आपको पता चलता है कि किसी गलत व्यक्ति ने आपके परिवार की जमीन पर फर्जी तरीके से वरासत का आवेदन कर दिया है, तो आप तुरंत अपने साक्ष्यों (जैसे परिवार रजिस्टर की नकल या वंशावली) के साथ तहसीलदार या राजस्व निरीक्षक के सामने लिखित आपत्ति (Objection) दाखिल करें।
  • आगे की प्रक्रिया: आपत्ति दर्ज होते ही वह सामान्य आवेदन रद्द हो जाता है और वह एक अदालती मुकदमा बन जाता है। इसके बाद तहसीलदार दोनों पक्षों को बुलाकर गवाही और सबूत लेता है, वकीलों की बहस सुनता है और फिर सही वारिस के हक में फैसला देता है।
  • अपील का मौका: अगर तहसीलदार की कोर्ट का फैसला आपके पक्ष में नहीं आता है, तो आप उस फैसले के खिलाफ 30 दिनों के भीतर एसडीएम (SDM) कोर्ट में अपील कर सकते हैं।

पिता की मृत्यु के बाद जमीन अपने नाम कैसे कराएं? (शॉर्टकट तरीका)

अगर पिता की मृत्यु हो गई है, तो बिना देर किए ये तीन काम करें:

  • कागज जुटाएं: पिता का मृत्यु प्रमाण पत्र, परिवार रजिस्टर की नकल, अपनी माता और भाई-बहनों के आधार कार्ड और जमीन की खतौनी निकालें।
  • आवेदन करें: किसी भी नजदीकी जनसेवा केंद्र (CSC) पर जाएं और Online Varasat UP पोर्टल पर फॉर्म भरवा दें।
  • समय सीमा: अगर कोई विवाद नहीं है, तो नियम के मुताबिक 30 से 45 दिनों के भीतर जमीन आपके नाम चढ़ जानी चाहिए।

अगर परिवार रजिस्टर में नाम न हो तो क्या करें?

कई बार तकनीकी गड़बड़ी के कारण किसी वारिस का नाम ‘परिवार रजिस्टर’ में नहीं होता। ऐसी स्थिति में:

  1. आप अपने ब्लॉक में ग्राम विकास अधिकारी (VDO) या सेक्रेटरी को प्रार्थना पत्र देकर और अपना पहचान पत्र लगाकर परिवार रजिस्टर में नाम दर्ज करवाने की प्रक्रिया शुरू करें।
  2. अगर इसमें ज्यादा समय लग रहा है, तो आप वरासत के आवेदन के साथ अपने गांव के प्रधान या वार्ड पार्षद से प्रमाणित कराई गई वंशावली (Vanshavali/Genealogy Tree) लगा सकते हैं। साथ ही एक नोटरी शपथ पत्र भी दे सकते हैं, जिसके आधार पर लेखपाल मौके की जांच करके अपनी रिपोर्ट लगा देता है।

वरासत की पूरी प्रक्रिया में कितना समय लगता है?

अगर जमीन पूरी तरह से निर्विवाद है, तो सरकारी नियमों के अनुसार समय-सीमा कुछ इस तरह होती है:

प्रक्रिया का चरणलगने वाला अनुमानित समय
ऑनलाइन फॉर्म भरना1 दिन (आपके द्वारा सबमिट करने का समय)
लेखपाल की जांच और रिपोर्टलगभग 15 दिन (स्थानीय जांच का समय)
राजस्व निरीक्षक (RI) का आदेशलगभग 15 दिन (कोई आपत्ति न आने पर)
खतौनी में नाम दिखना7 से 10 दिन (डिजिटल सिस्टम में अपडेट होने का समय)

ध्यान दें: अगर जमीन को लेकर कोई पारिवारिक विवाद है या किसी ने कोर्ट में आपत्ति लगा दी है, तो मामला राजस्व अदालत में चलने के कारण समय ज्यादा लग सकता है।

वरासत का आवेदन रिजेक्ट (निरस्त) क्यों हो जाता है?

कई बार लोग शिकायत करते हैं कि उनका आवेदन रद्द हो गया। इसके मुख्य कारण ये होते हैं:

  • गलत गाटा संख्या भरना: अगर फॉर्म भरते समय आपने अपने खेत या प्लॉट का नंबर (Gata Number) गलत चुन लिया है।
  • वैध मृत्यु प्रमाण पत्र का न होना: अगर मृत्यु प्रमाण पत्र स्पष्ट नहीं है या वह ऑनलाइन वेरीफाई नहीं हो रहा है।
  • पहले से कोई विवाद होना: अगर उसी जमीन को लेकर परिवार के ही किसी दूसरे सदस्य ने पहले से कोई मुकदमा या आपत्ति दर्ज करा रखी है।
  • अधूरे कागज अपलोड करना: परिवार रजिस्टर की नकल या जरूरी पहचान पत्र साफ अपलोड न करना।

वरासत और नामांतरण (Mutation) में मुख्य अंतर क्या है?

इन दोनों के अंतर को इस आसान तालिका से समझें:

तुलना का बिंदुवरासत (Inheritance)नामांतरण (Mutation / दाखिल-खारिज)
यह कब होता है?जब जमीन के असली मालिक की मृत्यु हो जाती है।जब जमीन को बेचा, दान (Gift) या अदला-बदली किया जाता है।
कौन सी धारा लगती है?उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 33 के तहत।उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 34 के तहत।
इसका मुख्य उद्देश्य क्या है?मृत व्यक्ति के परिवार के असली वारिसों को उनका पैतृक हक देना।जमीन खरीदने वाले नए व्यक्ति के नाम मालिकाना हक ट्रांसफर करना।
सरकारी फीस कितनी है?यह एक जरूरी जनसेवा है, इसलिए इसमें सरकारी फीस नाममात्र या शून्य होती है।इसमें जमीन की कीमत या नियमों के अनुसार तय कोर्ट फीस देनी होती है।

FAQ: (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

Q1. वरासत क्या होती है?

उत्तर: किसी मृत भूमि मालिक की जमीन को सरकारी कागजों (खतौनी) में उसके असली और कानूनी वारिसों के नाम दर्ज करने की प्रक्रिया को वरासत कहते हैं।

Q2. वरासत के लिए ऑनलाइन आवेदन कैसे करें?

उत्तर: आप राजस्व परिषद यूपी की वेबसाइट पर जाकर अपने मोबाइल नंबर से लॉगिन कर सकते हैं और मृतक, जमीन के नंबर (गाटा संख्या) तथा वारिसों की जानकारी भरकर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं।

Q3. वरासत में मुख्य रूप से कौन-कौन वारिस होते हैं?

उत्तर: मृतक की पत्नी, उनके बेटे, विवाहित और अविवाहित बेटियां प्राथमिक तौर पर मुख्य वारिस होते हैं।

Q4. वरासत की प्रक्रिया पूरी होने में कितना समय लगता है?

उत्तर: अगर जमीन को लेकर कोई विवाद नहीं है, तो आवेदन करने के बाद लगभग 30 से 45 दिनों के भीतर प्रक्रिया पूरी हो जाती है।

Q5. हम अपने वरासत आवेदन का स्टेटस कैसे ट्रैक कर सकते हैं?

उत्तर: आप VAAD UP पोर्टल पर जाकर अपनी ‘आवेदन संख्या’ या ‘मोबाइल नंबर’ डालकर देख सकते हैं कि आपका काम किस अधिकारी के पास लंबित है।

Q6. वरासत का आदेश होने के बाद क्या करना चाहिए?

उत्तर: आदेश होने के बाद यूपी भूलेख की वेबसाइट से नई खतौनी निकालकर चेक करें कि सभी वारिसों के नाम की स्पेलिंग और जमीन का नंबर सही दर्ज हुआ है या नहीं।

Q7. आदेश होने के कितने दिन बाद खतौनी में नाम चढ़ता है?

उत्तर: राजस्व निरीक्षक (RI) द्वारा ऑनलाइन आदेश पारित किए जाने के लगभग 7 से 10 दिनों के भीतर डिजिटल खतौनी में नाम अपडेट हो जाता है।

Q8. पिता की मृत्यु के बाद जमीन अपने नाम कैसे करवाएं?

उत्तर: पिता की मृत्यु के बाद उनके मृत्यु प्रमाण पत्र और परिवार रजिस्टर की नकल के साथ राजस्व परिषद के पोर्टल पर ऑनलाइन फॉर्म भरकर जमीन अपने और अन्य वारिसों के नाम कराई जा सकती है।

Q9. वाद यूपी (VAAD UP) पोर्टल क्या है?

उत्तर: यह उत्तर प्रदेश की राजस्व अदालतों का एक ऑनलाइन सिस्टम (RCCMS) है, जहाँ जमीन के मुकदमों की स्थिति, सुनवाई की तारीख और कोर्ट के आदेश देखे जा सकते हैं।

Q10. अगर जमीन पर कोई पुराना केस चल रहा है तो कैसे पता करें?

उत्तर: आप VAAD UP पोर्टल पर ‘विवादित गाटा खोजें’ विकल्प पर जाकर अपने खेत का नंबर (गाटा संख्या) डालकर चेक कर सकते हैं कि उस जमीन पर कोई मुकदमा चल रहा है या नहीं।

Q11. क्या वरासत और दाखिल-खारिज एक ही चीज है?

उत्तर: नहीं, मौत के बाद वारिसों का नाम चढ़ना वरासत (धारा 33) कहलाता है, जबकि जमीन खरीदने या बेचने के बाद नए मालिक का नाम चढ़ना दाखिल-खारिज या नामांतरण (धारा 34) कहलाता है।

Q12. अगर परिवार रजिस्टर में नाम न हो तो क्या वरासत रुक जाएगी?

उत्तर: नहीं, परिवार रजिस्टर में नाम न होने पर आप अपने गांव के प्रधान या वार्ड पार्षद से प्रमाणित कराई गई वंशावली और एक शपथ पत्र लगाकर भी आवेदन कर सकते हैं।

डिस्क्लेमर: यह लेख उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता और राजस्व परिषद के नियमों के आधार पर केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता के लिए है। इसे कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी तकनीकी या अदालती मामले में तहसील के संबंधित राजस्व अधिकारी या कानूनी विशेषज्ञ से परामर्श जरूर लें।

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